स्वामी वैष्णव कुल भूषण श्रीलक्ष्मी रामदासजी महाराज ने मानव के सर्वतोमुखी संस्कार और परिष्कार के लिए वैष्णव शिक्षा पद्धति के प्रचार एवं प्रसार पर बल दिया था और उसे ही एकमात्र कल्याणकारी घोषित किया था | उनके पदचिन्हों पर चलने का व्रत लेने वाले स्वनाम धन्य स्वामी श्री नन्दलालदासजी, श्री चरणदासजी, श्री हरिदासजी, एवं श्री रामप्रसादजी आदि अनेक सन्तों ने इस परम तथ्य को स्वीकार कर उसे क्रियान्वित करने का संकल्प लिया था |
इसी क्रम में श्री वैष्णवधर्म संस्कृत महाविधालय की स्थापना स्वामी श्री रामप्रसादाचार्य जी महाराज के गद्दी के नवें गादीपति श्री स्वामी राममनोहर प्रसादाचार्य जी महाराज के द्वारा श्रावण पूर्णिमा संवत् १९८२ विक्रमी तद्नुसार सन १९२५ ई० को की गयी |
वैष्णव धमोंपद्देश्याः -
- वेद वेदांगों के पठन पाठन से धार्मिक, समाजिक, नैतिक विद्वान उत्पन्न करके प्राणिमात्र के कल्याण के लिये समर्पित करना और गुण कर्मानुसार वर्णाश्रम की व्यवस्था करना |
- संस्कृत के अध्ययन की विशेषता पर बल देते हुए शिल्प विद्या और पदार्थ विग्यानादि आधुनिकतम विषयों के अध्ययन का विस्तार करना |
- प्रचार और प्रसार का समन्वय करने के निमित अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करना |
श्री स्वामी राममनोहर प्रसादाचार्य जी महाराज श्री स्वामी रामप्रसादाचार्य जी महाराज के गद्दी के सभी आचार्यो में परम तेजस्वी, तपस्वी एवं संस्कृत के उच्चकोटि के विद्वान थे| स्वामीजी की जन्म्भूमि चित्रकूट के पास बाँदा जिले में थी| स्वामी श्री राममनोहर प्रसादाचार्य जी महाराज
बाल्यकाल में ही श्री अयोध्याजी आकर वैष्णव विरक्त दीक्षा श्री रामप्रसादाचार्य जी महाराज के गद्दी के आठवें गादीपति श्रीस्वामी गोपालप्रसादाचार्य जी महाराज से प्राप्त कर सन्तसेवा एवं भगवद् भक्ति में लीन हो गये| उन्होंनें संस्कृत के प्राचार-प्रासार के लिए ही इस श्री वैष्णव धर्म संस्कृत
स्नात्कोत्तर महाविद्यालय की स्थापना किये, जिससे बच्चों का सर्वागीण विकास हो सके |
श्रीस्वामी रामप्रसादाचार्य जी महाराज नैमिषारण्य जिले के सण्डीला नामक ग्राम स्थान पर एक कान्यकुब्ज ब्राहमण कुल में माँ सुशीला की गोद में अवतीर्ण हुए | वह दिन था श्रावण शुक्ल सप्त्मी ब्रहम सम्वत् १७६०| इनके पिता पं० हीरामणि जी एक प्रकाण्ड विद्वान थे | बचपन से
युवावस्था के बीच उन्होने संस्कृत व्याकरण आदि में पाण्डित्य प्राप्त कर लिया | वार्ता में वे हिन्दी संस्कृत ही बोलते थे | स्वामी हरिदास जी से वैष्णव दीक्षा लेकर स्वामी राम प्रसादाचार्य जी जी ने अपनी साधाना प्रारम्भ किये |
श्री वैष्णवधर्म इनके चिंतन का भी प्रतिबिम्ब था | स्वामीजी ओजस्वी वक्ता निर्भीक एवं कर्मठ सन्त थे | श्री वैष्णव धर्म संचालन का गुरुत्तर भार होते हुए भी जीवन भर उन्होंने किसी धनी के समक्ष दयनीयता से हाथ
नहीं फैलाया | अपने परिश्रम एवं व्यक्तित्व से जो थोडा बहुत धन मिला उसी से संयमपूर्वक कार्य चलाते रहे | यह उनके ही व्यक्तित्व का प्रभाव है | श्री वैष्णव धर्म आज भी अपनी सन्तोष वृत्ति पर ही बढ रहा है | वे अपने जीवनकाल
तक उद्देश्य पूर्ति में ही लगे रहे | उन्हे निन्दा और स्तुति दोनो ही समान थी | धरातल में मुक्ति को देने वाली श्री भगवत् भक्ति का प्रचार कर १८६१ संवत के में श्रावण शुक्ल तृतीया को श्री राम प्रसाद जी महाराज
सुखरूप सर्वोत्कृष्ट श्रीसाकेतधाम को पधारे |
श्रीवैष्णवधर्म के वर्तमान प्रणेता एंव श्रीवैष्णवधर्म संस्कृत महाविद्यायल के प्रबन्धक एंव अध्यक्ष जो दैदीप्य्मान नक्षत्र की भांति श्री श्री १००८ महान्त श्री देवेन्द्र प्रसादाचार्य जी महाराज विधालय को अच्छी गति प्रदान किये हुए हैं इसके तरफ से विधालय के छात्रों के लिए छात्रावास
भोजन, कपड़ा, पुस्तकादि निःशुल्क वितरण कर रहें हैं संस्कृत पंडित विद्वान ,गरीब,सन्त सेवी, गौसेवी दीन-दुःखियों को सहारा देने वाले कर्मठ विद्वान वैष्णव धर्म का परीपालन अनवरत गति से कर रहे हैं| जो आशा नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास हैं कि इनके द्वारा संस्था को भविष्य में उन्न्यन मिलता रहेगा |
श्री वैष्णव धर्म प्राचीन काल से संचालित शिक्षा बहुकाल तक सर्वव्यापक एवं सर्वग्राह्य रही | आचार्यों के सानिध्य में शिक्षा प्राप्ति के लिये भारतीय ही नहीं अपितु समग्र देश के शिक्षार्थी आकर्षित होते रहे |
मानवीय उच्च आदर्शों एवं "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना से ओत प्रोत ये शिक्षा केन्द्र अपना एक गौरवपूर्ण स्थान रखते हैं | वैदेशिकों के प्रभाव ने हमारी प्राच्य शिक्षा व्यवस्था को विश्रृंखलित कर स्कूली शिक्षा को जन्म दिया, जहॉं आचार्य और विद्यार्थी का सानिध्य अल्पकालिक ही रहता है |
अधिकांश समय बालक अपने पारिवारिक परिवेश में ही व्यतीत करता है | व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की कल्पना मात्र वैचारिक रूप लेकर रह गयी | वैदिक शिक्षार्थी अपनी बौद्धिक क्षमता का उत्कृष्ट प्रदर्शन कर अपना गौरवपूर्ण स्थान बनाने में सफल रहे |
परिणामस्वरूप वैदेशिकों में ईर्ष्या भाव का उद्भव होना स्वाभाविक था |
भारतीय प्रतिभा वेद विहित सिद्धान्तों पर विकिसित है जिसका उद्घोष प्राचीन काल से ही "रामो विजयतेताराम" रहा है | सम्प्रति अवैदिक आधार पर निर्मित राष्ट्रों के इस अत्याचार पर सम्प्रभुता सम्पन्न भारत राष्ट्र को तत्क्षण प्रभावी रोक लगाने के लिए पूर्ण मनोयोग से प्रयास कर शिक्षा के उदार स्वरूप की स्थापना में सहयोग करना चाहिए |